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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 125: हनुमान्जी का निषादराज गुह तथा भरतजी को श्रीराम के आगमन की सूचना देना और प्रसन्न हुए भरत का उन्हें उपहार देने की घोषणा करना  »  श्लोक 36-38h
 
 
श्लोक  6.125.36-38h 
वसन्तं दण्डकारण्ये यं त्वं चीरजटाधरम्॥ ३६॥
अनुशोचसि काकुत्स्थं स त्वां कौशलमब्रवीत्।
प्रियमाख्यामि ते देव शोकं त्यज सुदारुणम्॥ ३७॥
अस्मिन् मुहूर्ते भ्रात्रा त्वं रामेण सह संगत:।
 
 
अनुवाद
देव! आप दण्डकारण्य में चीर और जटाधारी श्री रघुनाथजी के लिए सदैव चिंतित रहते हैं। उन्होंने आपको अपना कुशल-क्षेम बताया है और आपके विषय में भी पूछा है। अब आप इस अत्यंत दुःखद शोक को त्याग दें। मैं आपको बहुत शुभ समाचार सुनाता हूँ। आप शीघ्र ही अपने भाई श्री राम से मिलेंगे। 36-37 1/2।
 
Dev! You are always worried about Shri Raghunathji, who lives in Dandakaranya wearing a rag and matted hair. He has informed you about his well-being and has also asked about you. Now you should leave this very painful grief. I am telling you very good news. You will soon meet your brother Shri Ram. 36-37 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)