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ramayan 6.125.17: यदि कैकेयी के संग से अथवा बहुत समय तक राजसी वैभव के सम्पर्क में रहने से श्रीमान भरत स्वयं राजा बनने की इच्छा करें, तो वे रघुकुलपुत्र भरत निर्भय होकर सम्पूर्ण जगत् का शासन करें (मैं उस राज्य को लेना नहीं चाहता। ऐसी स्थिति में मैं अन्यत्र रहकर तपस्वी का जीवन व्यतीत करूँगा)।॥ 17॥   |   ramayan सर्ग 6.125: हनुमान्जी का निषादराज गुह तथा भरतजी को श्रीराम के आगमन की सूचना देना और प्रसन्न हुए भरत का उन्हें उपहार देने की घोषणा करना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 125: हनुमान्जी का निषादराज गुह तथा भरतजी को श्रीराम के आगमन की सूचना देना और प्रसन्न हुए भरत का उन्हें उपहार देने की घोषणा करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.125.17 
संगत्या भरत: श्रीमान् राज्येनार्थी स्वयं भवेत्।
प्रशास्तु वसुधां सर्वामखिलां रघुनन्दन:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
यदि कैकेयी के संग से अथवा बहुत समय तक राजसी वैभव के सम्पर्क में रहने से श्रीमान भरत स्वयं राजा बनने की इच्छा करें, तो वे रघुकुलपुत्र भरत निर्भय होकर सम्पूर्ण जगत् का शासन करें (मैं उस राज्य को लेना नहीं चाहता। ऐसी स्थिति में मैं अन्यत्र रहकर तपस्वी का जीवन व्यतीत करूँगा)।॥ 17॥
 
If due to the association of Kaikeyi or being in contact with the royal splendors for a long time, Shriman Bharat himself desires to become the king, then that son of the Raghukul, Bharat should rule the whole world without any fear (I do not wish to take that kingdom. In that case I will live somewhere else and lead an ascetic's life).॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)