श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 125: हनुमान्जी का निषादराज गुह तथा भरतजी को श्रीराम के आगमन की सूचना देना और प्रसन्न हुए भरत का उन्हें उपहार देने की घोषणा करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.125.1 
अयोध्यां तु समालोक्य चिन्तयामास राघव:।
प्रियकाम: प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रम:॥ १॥
 
 
अनुवाद
विमान से अयोध्यापुरी का भ्रमण करने के पश्चात् (भारद्वाज के आश्रम पर उतरने से पूर्व) रघुकुल के पुत्र, वेगशाली एवं पराक्रमी श्री रामजी, जो अयोध्यावासियों और सुग्रीव को प्रिय लगने की इच्छा रखते थे, इस विषय में विचार करने लगे कि मैं किस प्रकार सबका प्रिय बनूँ॥1॥
 
After visiting Ayodhyapuri from his aeroplane (before alighting at Bharadwaj's ashram), Shri Ram, the son of the Raghukul and the swift and valiant, who desired to be liked by the people of Ayodhya and Sugreeva, thought about how to be liked by all of them.॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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