|
| |
| |
श्लोक 6.123.57  |
ततस्तु तां पाण्डुरहर्म्यमालिनीं
विशालकक्ष्यां गजवाजिभिर्वृताम्।
पुरीमपश्यन् प्लवगा: सराक्षसा:
पुरीं महेन्द्रस्य यथामरावतीम्॥ ५७॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| तत्पश्चात् वानरों और राक्षसों ने अयोध्या नगरी को देखना आरम्भ किया, जो श्वेत मीनारों और विशाल भवनों से सुशोभित थी, जो हाथियों और घोड़ों से भरी हुई थी और देवताओं के राजा इन्द्र की अमरावती नगरी के समान सुन्दर दिख रही थी। |
| |
| Thereafter the monkeys and the demons began to see the city of Ayodhya, which was adorned with white towers and huge buildings, which was full of elephants and horses and looked as beautiful as the city of Amaravati of the king of gods Indra. |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततम: सर्ग: ॥ १ २३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ २३॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|