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श्लोक 6.123.54-55  |
शृङ्गवेरपुरं चैतद् गुहो यत्र सखा मम।
एषा सा दृश्यते सीते सरयूर्यूपमालिनी॥ ५४॥
एषा सा दृश्यते सीते राजधानी पितुर्मम।
अयोध्यां कुरु वैदेहि प्रणामं पुनरागता॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| 'यह श्रृंगवेरपुर है, जहाँ मेरे मित्र गुह रहते हैं। सीते! यहाँ यूपमालाओं से सुशोभित सरयू नदी है, जिसके तट पर मेरे पिता की राजधानी है। विदेहनन्दिनी! आप वनवास के बाद अयोध्या लौटी हैं। अतः इस नगरी को प्रणाम करो।'॥54-55॥ |
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| ‘This is Shringaverpur, where my friend Guha lives. Sita! Here is the Saryu river decorated with garlands of yupamalas, on the banks of which is my father's capital. Videhanandini! You have returned to Ayodhya after exile. Therefore, bow to this city.'॥ 54-55॥ |
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