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श्लोक 51
श्लोक
6.123.51
असौ सुतनु शैलेन्द्रश्चित्रकूट: प्रकाशते।
अत्र मां कैकयीपुत्र: प्रसादयितुमागत:॥ ५१॥
अनुवाद
'सुतनु! वह चित्रकूट पर्वत जगमगा रहा है। वहीं कैकेयी के पुत्र भरत मुझे प्रसन्न करके वापस ले जाने आए थे।'
‘Sutnu! That mountainous Chitrakoot is shining. That is where Kaikeyi's son Bharat came to please me and bring me back. 51.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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