श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 123: अयोध्या की यात्रा करते समय श्रीराम का सीताजी को मार्ग के स्थान दिखाना  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  6.123.47-48 
दीप्तश्चैवाश्रमे ह्येष सुतीक्ष्णस्य महात्मन:॥ ४७॥
दृश्यते चैव वैदेहि शरभङ्गाश्रमो महान्।
उपयात: सहस्राक्षो यत्र शक्र: पुरंदर:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
'यह महात्मा सुतीक्ष्ण और विदेहनन्दिनी का तेजस्वी आश्रम है! शरभंग मुनीक का महान आश्रम दृष्टिगोचर है, जहाँ सहस्र नेत्रों वाले पुरन्दर इन्द्र आये थे।
 
‘This is the radiant ashram of Mahatma Sutikshna and Videhanandini! The great ashram of Sharbhang Munika is visible, where the thousand-eyed Purandar Indra had come.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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