श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 122: श्रीराम की आज्ञा से विभीषण द्वारा वानरों का विशेष सत्कार तथा सुग्रीव और विभीषण सहित वानरों को साथ लेकर श्रीराम का पुष्पकविमान द्वारा अयोध्या को प्रस्थान करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  6.122.9 
हीनं रतिगुणै: सर्वैरभिहन्तारमाहवे।
सेना त्यजति संविग्ना नृपतिं तं नरेश्वर॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जो राजा दान, आदर आदि उन समस्त गुणों से रहित है, जो सेवकों में प्रेम उत्पन्न करते हैं, युद्ध के समय उत्तेजित सेना उसे यह सोचकर त्याग देती है कि वह हमें व्यर्थ ही मरवा रहा है - उसे हमारे भरण-पोषण या कल्याण की तनिक भी चिंता नहीं रहती।॥9॥
 
O Lord of men! The king who is devoid of all the virtues like charity, respect etc. which generate love in the servants, the agitated army abandons him at the time of war, thinking that he is getting us killed in vain - he is not concerned at all about our maintenance or welfare.'॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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