श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 122: श्रीराम की आज्ञा से विभीषण द्वारा वानरों का विशेष सत्कार तथा सुग्रीव और विभीषण सहित वानरों को साथ लेकर श्रीराम का पुष्पकविमान द्वारा अयोध्या को प्रस्थान करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.122.8 
त्यागिनं संग्रहीतारं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम्।
सर्वे त्वामभिगच्छन्ति तत: सम्बोधयामि ते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
ऐसा करने से सब लोग जान लेंगे कि विभीषण समय पर धन का त्याग और दान करता है, न्यायपूर्वक धन और रत्न आदि का संचय करता रहता है, दयालु है और अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है; इसीलिए मैं तुम्हें ऐसा करने की सलाह दे रहा हूँ॥8॥
 
By doing so everyone will know that Vibhishan renounces and donates wealth at appropriate times, keeps accumulating wealth and precious stones etc. in a just and proper manner, is kind and has controlled his senses; that is why I am advising you to do so.॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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