श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 121: श्रीराम का अयोध्या जाने के लिये उद्यत होना और उनकी आज्ञा से विभीषण का पुष्पक विमान को मँगाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.121.21 
अनुजानीहि मां सौम्य पूजितोऽस्मि विभीषण।
मन्युर्न खलु कर्तव्य: सखे त्वां चानुमानये॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे विभीषण! अब आप मुझे जाने की अनुमति दें। आपने मेरा बहुत आदर किया है। मित्र! मेरे इस हठ के कारण मुझ पर क्रोध न करें। इसके लिए मैं आपसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ।
 
Gentle Vibhishan! Now you should allow me to go. I have been honoured by you a lot. Friend! Do not be angry with me for this stubbornness of mine. I request you again and again for this.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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