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ramayan 6.121.18-19: हे दैत्यराज! मैं आपकी बात का खंडन तो नहीं कर सकता; परन्तु इस समय मेरा मन अपने भाई भरत को देखने के लिए अधीर हो रहा है, जो मुझे वापस ले जाने के लिए चित्रकूट आए थे और जिनके चरणों में सिर झुकाकर विनती करने पर भी मैंने उनकी बात नहीं सुनी थी॥ 18-19॥   |   ramayan सर्ग 6.121: श्रीराम का अयोध्या जाने के लिये उद्यत होना और उनकी आज्ञा से विभीषण का पुष्पक विमान को मँगाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 121: श्रीराम का अयोध्या जाने के लिये उद्यत होना और उनकी आज्ञा से विभीषण का पुष्पक विमान को मँगाना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  6.121.18-19 
न खल्वेतन्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर।
तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मन:॥ १८॥
मां निवर्तयितुं योऽसौ चित्रकूटमुपागत:।
शिरसा याचतो यस्य वचनं न कृतं मया॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे दैत्यराज! मैं आपकी बात का खंडन तो नहीं कर सकता; परन्तु इस समय मेरा मन अपने भाई भरत को देखने के लिए अधीर हो रहा है, जो मुझे वापस ले जाने के लिए चित्रकूट आए थे और जिनके चरणों में सिर झुकाकर विनती करने पर भी मैंने उनकी बात नहीं सुनी थी॥ 18-19॥
 
O Lord of demons! I certainly cannot deny your words; but at this moment my mind is impatient to see my brother Bharat, who had come to Chitrakoot to take me back and whose words I had not listened to even after he had begged me with his head bowed at my feet.॥ 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)