श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 12: रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.12.34 
त्वयेदं महदारब्धं कार्यमप्रतिचिन्तितम्।
दिष्टॺा त्वां नावधीद् रामो विषमिश्रमिवामिषम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'महाराज! तुमने भविष्य के परिणामों का विचार किए बिना ही यह महान् पाप आरम्भ कर दिया है। जैसे विष मिला हुआ भोजन खाने वाले के प्राण हर लेता है, उसी प्रकार श्री रामचन्द्रजी तुम्हारा वध करेंगे। उन्होंने अभी तक तुम्हें नहीं मारा, इसे अपना सौभाग्य समझो।॥34॥
 
‘Maharaj! You have started this great misdeed without thinking about the future consequences. Just as food mixed with poison takes away the life of the person who eats it, in the same way Shri Ramchandraji will kill you. He has not killed you yet, consider it a matter of good fortune for you. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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