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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 12: रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.12.33 
चपलस्य तु कृत्येषु प्रसमीक्ष्याधिकं बलम्।
छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजा:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
शत्रु यह देखकर कि उनके विरोधी का बल उनसे अधिक है, परन्तु वह सब कार्यों में शीघ्रता करता है, उसे दबाने के लिए वे उसी प्रकार मार्ग खोजते रहते हैं, जैसे पक्षी उस दुर्गम क्रौंच पर्वत (जिसे कुमार कार्तिकेय ने अपनी शक्ति से उत्पन्न किया था) के बिल में शरण लेते हैं, ताकि उसे लांघ सकें॥ 33॥
 
The enemies, seeing that their opponent's strength is greater than theirs but he is hasty in all his actions, keep looking for loopholes in order to suppress him, just as birds take shelter in the hole* of the difficult Krauncha mountain (created by Kumar Kartikeya by using his power) in order to jump over it.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)