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ramayan 6.12.31: जो कर्म उचित विधि का आश्रय लिए बिना किए जाते हैं तथा जो समाज और शास्त्रों की मर्यादा के विरुद्ध हैं, वे अपवित्र और दुष्ट यज्ञों में की गई आहुतियों के समान पापमय हैं॥31॥   |   ramayan सर्ग 6.12: रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 12: रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  6.12.31 
अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो कर्म उचित विधि का आश्रय लिए बिना किए जाते हैं तथा जो समाज और शास्त्रों की मर्यादा के विरुद्ध हैं, वे अपवित्र और दुष्ट यज्ञों में की गई आहुतियों के समान पापमय हैं॥31॥
 
Those deeds which are performed without resorting to the proper methods and which are contrary to the norms of society and the scriptures, are as sinful as the offerings made in unholy and wicked sacrifices.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)