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ramayan 6.12.17-18h: जो काम क्रोध और प्रसन्नता में एक सा रहता है, जो शरीर की कान्ति को मंद कर देता है, तथा जो शोक और संताप के समय भी मन से दूर नहीं होता, उसी काम ने मेरे हृदय को कलंकित कर दिया है॥17 1/2॥   |   ramayan सर्ग 6.12: रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 12: रावण का सीता हरण का प्रसंग बताना , कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओं के वध का स्वयं ही भार उठाना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  6.12.17-18h 
क्रोधहर्षसमानेन दुर्वर्णकरणेन च॥ १७॥
शोकसंतापनित्येन कामेन कलुषीकृत:।
 
 
अनुवाद
जो काम क्रोध और प्रसन्नता में एक सा रहता है, जो शरीर की कान्ति को मंद कर देता है, तथा जो शोक और संताप के समय भी मन से दूर नहीं होता, उसी काम ने मेरे हृदय को कलंकित कर दिया है॥17 1/2॥
 
That which remains the same in anger and happiness, which dims the luster of the body, and which never goes away from the mind even in times of grief and anguish, that desire has tainted my heart.॥ 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)