श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 116: सीता का श्रीराम को उपालम्भपूर्ण उत्तर देकर अपने सतीत्व की परीक्षा देने के लिये अग्नि में प्रवेश करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.116.3 
प्रविशन्तीव गात्राणि स्वानि सा जनकात्मजा।
वाक्शरैस्तै: सशल्येव भृशमश्रूण्यवर्तयत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उन शब्दबाणों से पीड़ित होकर जनक की वह युवा कन्या अपने ही अंगों में विलीन होने लगी और उसके नेत्रों से अविरल आँसुओं की धारा बहने लगी॥3॥
 
Being afflicted by those verbal arrows, the young daughter of Janaka began to dissolve into her own body parts. A continuous flow of tears started flowing from her eyes.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)