श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 116: सीता का श्रीराम को उपालम्भपूर्ण उत्तर देकर अपने सतीत्व की परीक्षा देने के लिये अग्नि में प्रवेश करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.116.15 
अपदेशेन जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात्।
मम वृत्तं च वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे नीति के तत्त्व को जानने वाले भगवान! मैं राजा जनक की यज्ञभूमि से उत्पन्न होने के कारण जानकी कहलाती हूँ। वास्तव में मैं जनक से उत्पन्न नहीं हुई। मैं तो पृथ्वी से प्रकट हुई हूँ। (मैं सामान्य मनुष्यों से भिन्न हूँ - मैं दिव्य हूँ। इसी प्रकार मेरे आचरण और विचार भी अलौकिक और दिव्य हैं; मुझमें चरित्रबल है, परंतु) आपने मेरी इन विशेषताओं को अधिक महत्व नहीं दिया - आपने उन्हें अपने समक्ष नहीं रखा।॥15॥
 
‘O God who knows the essence of morality! I am called Janaki because I emerged from the sacrificial ground of King Janak. In reality, I was not born from Janak. I appeared from the earth. (I am different from ordinary human beings – I am divine. Similarly, my behavior and thoughts are also supernatural and divine; I have strength of character, but) you did not give much importance to these specialties of mine – you did not keep them before you.॥ 15॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd