श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 116: सीता का श्रीराम को उपालम्भपूर्ण उत्तर देकर अपने सतीत्व की परीक्षा देने के लिये अग्नि में प्रवेश करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.116.10 
सह संवृद्धभावेन संसर्गेण च मानद।
यदि तेऽहं न विज्ञाता हता तेनास्मि शाश्वतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे दूसरों को सम्मान देने वाले प्राणनाथ! हमारा परस्पर प्रेम सदैव साथ-साथ बढ़ता रहा है। हम सदैव साथ-साथ रहते आए हैं। इतना सब होने पर भी यदि आपने मुझे भली-भाँति नहीं समझा, तो मैं सदा के लिए नष्ट हो जाऊँगा॥10॥
 
‘O Prananath who gives respect to others! Our mutual love has always grown together. We have always lived together. Despite all this, if you did not understand me well, then I am doomed forever.॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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