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ramayan 6.115.3: 'अब मेरा क्रोध समाप्त हो गया है। मैंने अपने ऊपर लगा कलंक मिटा दिया है। मैंने शत्रु द्वारा किए गए अपमान और शत्रु दोनों को एक साथ नष्ट कर दिया है।'   |   ramayan सर्ग 6.115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.115.3 
गतोऽस्म्यन्तममर्षस्य धर्षणा सम्प्रमार्जिता।
अवमानश्च शत्रुश्च युगपन्निहतौ मया॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'अब मेरा क्रोध समाप्त हो गया है। मैंने अपने ऊपर लगा कलंक मिटा दिया है। मैंने शत्रु द्वारा किए गए अपमान और शत्रु दोनों को एक साथ नष्ट कर दिया है।'
 
‘Now my anger has ended. I have removed the stigma that was attached to me. I have destroyed both the insult caused by the enemy and the enemy together.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)