श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.115.21 
यदर्थं निर्जिता मे त्वं सोऽयमासादितो मया।
नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामिति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
अतः जिस उद्देश्य से मैंने तुम्हें जीता था, वह पूरा हो गया - मेरे कुल का कलंक दूर हो गया। अब मुझे तुम्हारे प्रति कोई स्नेह या आसक्ति नहीं है; अतः तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो॥ 21॥
 
‘So the purpose for which I had won you has been fulfilled – the stigma of my family has been removed. Now I have no affection or attachment towards you; hence you can go wherever you want.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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