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ramayan 6.115.18: अतः हे जनककुमारी! जहाँ चाहो वहाँ जाओ। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। हे प्रिये! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली हैं। अब मुझे तुमसे कोई प्रयोजन नहीं है॥18॥   |   ramayan सर्ग 6.115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  6.115.18 
तद् गच्छ त्वानुजानेऽद्य यथेष्टं जनकात्मजे।
एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया॥ १८॥
 
 
अनुवाद
अतः हे जनककुमारी! जहाँ चाहो वहाँ जाओ। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। हे प्रिये! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली हैं। अब मुझे तुमसे कोई प्रयोजन नहीं है॥18॥
 
‘Therefore, Janak Kumari! Go wherever you wish. I give you my permission. Dear one! All these ten directions are open for you. Now I have no use for you.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)