Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 6.115.14: जैसे तपस्य युक्त अन्तःकरण वाले अथवा तप द्वारा भगवान् के स्वरूप का चिंतन करने वाले महर्षि अगस्त्य ने वातापी और इल्वल के भय से प्राणी जगत के लिए दुर्गम दक्षिण दिशा को जीत लिया था, उसी प्रकार मैंने रावण के वश में पड़े हुए तुम लोगों को जीत लिया है॥14॥ | ramayan सर्ग 6.115: सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिये कहना । ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जैसे तपस्य युक्त अन्तःकरण वाले अथवा तप द्वारा भगवान् के स्वरूप का चिंतन करने वाले महर्षि अगस्त्य ने वातापी और इल्वल के भय से प्राणी जगत के लिए दुर्गम दक्षिण दिशा को जीत लिया था, उसी प्रकार मैंने रावण के वश में पड़े हुए तुम लोगों को जीत लिया है॥14॥
Just as Maharishi Agastya, who had a penance-filled conscience or contemplated the form of God with penance, had conquered the south direction which was inaccessible to the living world due to the fear of Vatapi and Ilval, in the same way I have conquered you who were under the influence of Ravana. 14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥