श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 114: श्रीराम की आज्ञा से विभीषण का सीता को उनके समीप लाना और सीता का प्रियतम के मुखचन्द्र का दर्शन करना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  6.114.5-6 
एवमुक्तो हनुमता रामो धर्मभृतां वर:।
आगच्छत् सहसा ध्यानमीषद‍्बाष्पपरिप्लुत:॥ ५॥
स दीर्घमभिनि:श्वस्य जगतीमवलोकयन्।
उवाच मेघसंकाशं विभीषणमुपस्थितम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हनुमानजी की यह बात सुनकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्री रामचन्द्रजी सहसा ध्यानमग्न हो गए। उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने गहरी साँस लेकर भूमि की ओर देखते हुए पास ही खड़े मेघ के समान श्याम वर्ण वाले विभीषण से कहा।
 
On hearing Hanuman say this, the best of the righteous, Shri Ramchandraji suddenly went into deep meditation. His eyes welled up with tears and he took a deep breath and looking towards the ground, he spoke to Vibhishana who was standing nearby and had a dark complexion like a cloud.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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