श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 114: श्रीराम की आज्ञा से विभीषण का सीता को उनके समीप लाना और सीता का प्रियतम के मुखचन्द्र का दर्शन करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.114.33 
कलत्रनिरपेक्षैश्च इङ्गितैरस्य दारुणै:।
अप्रीतमिव सीतायां तर्कयन्ति स्म राघवम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्र के उग्र हाव-भाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे अपनी पत्नी के प्रति उदासीन हो गए हैं। इसीलिए उन तीनों ने मान लिया कि श्री रघुनाथ सीता से अप्रसन्न प्रतीत होते हैं।
 
Shri Ramchandra's fierce gestures were indicating that he had become indifferent towards his wife. That is why the three of them assumed that Shri Raghunath seems to be unhappy with Sita.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas