श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 114: श्रीराम की आज्ञा से विभीषण का सीता को उनके समीप लाना और सीता का प्रियतम के मुखचन्द्र का दर्शन करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.114.17 
तामागतामुपश्रुत्य रक्षोगृहचिरोषिताम्।
रोषं हर्षं च दैन्यं च राघव: प्राप शत्रुहा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
यह सोचकर कि सीताजी आज राक्षस के घर में बहुत दिनों तक रहकर आई हैं, उनके आगमन का समाचार सुनकर शत्रुघ्न श्री रघुनाथजी को क्रोध, हर्ष और शोक एक साथ हुआ॥17॥
 
Thinking that Sitaji has come today after staying in the demon's house for a long time, on hearing the news of her arrival, Shatrughan Sri Raghunathji felt anger, joy and sorrow at the same time. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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