| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » सर्ग 107: श्रीराम और रावण का घोर युद्ध » श्लोक 15-16h |
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| | | | श्लोक 6.107.15-16h  | रामस्य तुरगान् दीप्तै: शरैर्विव्याध रावण:।
ते दिव्या हरयस्तत्र नास्खलन्नापि बभ्रमु:॥ १५॥
बभूवु: स्वस्थहृदया: पद्मनालैरिवाहता:। | | | | | | अनुवाद | | रावण ने अपने तेजस्वी बाणों से श्री रामचन्द्रजी के घोड़ों को घायल करना आरम्भ किया; किन्तु वे घोड़े दिव्य थे, इसलिए न तो लड़खड़ाए, न अपने स्थान से हिले। वे पहले की भाँति स्वस्थ रहे, मानो उन पर कमल के डंठलों से प्रहार किया गया हो। | | | | Ravana began to injure the horses of Shri Ramchandra with his brilliant arrows; but those horses were divine, so they neither stumbled nor moved from their place. They remained healthy as before, as if they had been attacked with lotus stalks. | | ✨ ai-generated | | |
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