श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.105.7 
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन:।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभि:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'सभी देवता उन्हीं के स्वरूप हैं। वे ही अपनी किरणों और तेज से जगत को शक्ति और ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे ही अपनी किरणों का विस्तार करके देवताओं और दानवों सहित समस्त लोकों को धारण करते हैं।॥7॥
 
‘All the gods are His manifestations. He is the one who provides power and energy to the world with his rays and with his glow. He is the one who supports all the worlds including the gods and demons by spreading his rays.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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