श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  6.105.4-5 
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्॥ ४॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इस गोपनीय स्तोत्र का नाम 'आदित्य हृदय' है। यह परम पवित्र और समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदैव विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणकारी स्तोत्र है। यह समस्त शुभ व्यक्तियों के लिए भी मंगलकारी है। यह समस्त पापों का नाश करता है। यह चिंता और शोक को दूर करने तथा आयु बढ़ाने का उत्तम साधन है। 4-5॥
 
‘The name of this confidential stotra is ‘Aditya Hridaya’. It is most sacred and destroyer of all enemies. Chanting it always leads to victory. This is an eternally renewable and supremely beneficial hymn. It is also auspicious for all the auspicious people. This destroys all sins. This is an excellent means to eliminate worry and sorrow and increase lifespan. 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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