श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.105.23 
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित:।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
ये प्राणी सम्पूर्ण तत्त्वों में अन्तर्यामी रूप से निवास करते हैं, तथा सो जाने पर भी जागृत रहते हैं। अग्निहोत्र और अग्निहोत्री पुरुषों का यही लाभ है॥23॥
 
‘These beings reside in all elements as the inner controller, they remain awake even when they go to sleep. These are the benefits of Agnihotra and Agnihotri men.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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