श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.105.22 
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभु:।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! सूर्यदेव ही समस्त जीवों का संहार, सृजन और पालन करते हैं। वे ही अपनी किरणों से ताप प्रदान करते हैं और वर्षा करते हैं।
 
‘Raghunandan! It is the Sun God who destroys, creates and nurtures all living entities. It is He who provides heat and rains through His rays.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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