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श्लोक 6.105.22  |
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभु:।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि:॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| 'रघुनंदन! सूर्यदेव ही समस्त जीवों का संहार, सृजन और पालन करते हैं। वे ही अपनी किरणों से ताप प्रदान करते हैं और वर्षा करते हैं। |
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| ‘Raghunandan! It is the Sun God who destroys, creates and nurtures all living entities. It is He who provides heat and rains through His rays. |
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