श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.105.21 
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'आपकी प्रभा तपे हुए सोने के समान है। आप हरि (अज्ञान का नाश करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार के रचयिता) हैं; आप अंधकार का नाश करने वाले, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं; मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ 21॥
 
‘Your radiance is like heated gold. You are Hari (the destroyer of ignorance) and Vishwakarma (the creator of the world); you are the destroyer of darkness, the embodiment of light and the witness of the world; I salute you.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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