श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 105: अगस्त्य मुनि का श्रीराम को विजय के लिये “आदित्यहृदय” के पाठ की सम्मति देना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  6.105.1-2 
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ १॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
उधर श्री रामचंद्रजी युद्ध से थके हुए और चिंतित होकर युद्धभूमि में खड़े थे। इतने में ही रावण भी युद्ध के लिए उनके समक्ष उपस्थित हुआ। यह देखकर देवताओं के साथ युद्ध देखने आए भगवान अगस्त्य मुनि श्री राम के पास गए और बोले-॥1-2॥
 
On the other hand, Shri Ramchandraji was standing on the battlefield, tired of the war and worried. Meanwhile, Ravana also appeared before him for the war. Seeing this, Lord Agastya Muni, who had come to see the war with the Gods, went to Shri Ram and said -॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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