श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम का रावण को फटकारना और उनके द्वार घायल किये गये रावण को सारथि का रणभूमि से बाहर ले जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.103.22 
अद्य मद‍्बाणभिन्नस्य गतासो: पतितस्य ते।
कर्षन् त्वन्त्राणि पतगा गरुत्मन्त इवोरगान्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
आज मेरे बाणों से बिंधकर प्राणहीन पड़े हुए तुम्हारे शरीर की अंतड़ियाँ पक्षी उसी प्रकार खींच लें, जैसे बाज साँपों को खींच लेते हैं।॥22॥
 
Today, pierced by my arrows and lying lifeless, may the birds pull out the intestines of your body, just as eagles pull out snakes.'॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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