श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 101: श्रीराम का विलाप तथा हनुमान्जी की लायी हुर्इ ओषधि के सुषेण द्वारा किये गये प्रयोग से लक्ष्मण का सचेत हो उठना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  6.101.9 
राघवो भ्रातरं दृष्ट्वा प्रियं प्राणं बहिश्चरम्।
दु:खेन महताविष्टो ध्यानशोकपरायण:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
अपने प्राणों के समान प्रिय भाई लक्ष्मण को इस दशा में बाहर भटकते देखकर श्री रघुनाथजी महान शोक से भर गए और चिंता एवं शोक में डूब गए॥9॥
 
Seeing his brother Lakshman, who was as dear to him as his life, wandering outside in this condition, Sri Raghunatha was filled with great sorrow and was drowned in worry and grief.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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