श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 101: श्रीराम का विलाप तथा हनुमान्जी की लायी हुर्इ ओषधि के सुषेण द्वारा किये गये प्रयोग से लक्ष्मण का सचेत हो उठना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.101.5 
अयं स समरश्लाघी भ्राता मे शुभलक्षण:।
यदि पञ्चत्वमापन्न: प्राणैर्मे किं सुखेन वा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यदि मेरे ये अच्छे भाई, जो सदैव युद्ध करने का साहस रखते थे, मर जाएँ, तो उनके प्राण लेकर मेरे लिए सुख भोगने से क्या लाभ?॥5॥
 
If these good brothers of mine, who always had the courage to fight, die, then what is the use of keeping their lives and enjoying happiness for me?॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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