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श्लोक 5.67.13  |
स त्वं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भं तं वायसं प्रति।
ततस्तु वायसं दीप्त: स दर्भोऽनुजगाम ह॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| 'आपने वह जलती हुई कुशा कौए की ओर छोड़ दी। तब वह चमकती हुई दर्भा उस कौए का पीछा करने लगी।॥13॥ |
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| ‘You left that burning Kusha towards the crow. Then that shining Darbha started chasing that crow.॥ 13॥ |
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