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श्लोक 5.65.27  |
एतदेव मयाऽऽख्यातं सर्वं राघव यद् यथा।
सर्वथा सागरजले संतार: प्रविधीयताम्॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| रघुनन्दन! यह उस स्थान की कथा है, जो मैंने तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत की है। अब तुम सब प्रकार से समुद्र को पार करने का प्रयत्न करो।॥27॥ |
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| Raghunandan! This is the story of that place, all of which I have presented to you. Now try to cross the ocean in every possible way.'॥ 27॥ |
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