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श्लोक 5.61.19  |
तुदन्तमन्य: प्रणदन्नुपैति
समाकुलं तत् कपिसैन्यमासीत्।
न चात्र कश्चिन्न बभूव मत्तो
न चात्र कश्चिन्न बभूव दृप्त:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| जब एक दूसरे को सताता, तो दूसरा जोर से गर्जना करता हुआ उसके पास आ जाता। इस प्रकार सारी वानर सेना मतवाली होकर उसी के अनुसार कार्य कर रही थी। उस वानर समूह में ऐसा कोई न था जो मतवाला न हो और ऐसा कोई न था जो अभिमान से भरा न हो॥19॥ |
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| When one would torment another, the other would come to him roaring loudly. Thus the entire army of monkeys was acting in accordance with it in a drunken state. There was no one in that group of monkeys who had not become drunk and there was no one who was not filled with pride.॥19॥ |
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