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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 60: अङ्गद का लङ्का को जीतकर सीता को ले आने का उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान् के द्वारा उसका निवारण  »  श्लोक 2-4h
 
 
श्लोक  5.60.2-4h 
पितामहवरोत्सेकात् परमं दर्पमास्थितौ।
अश्विनोर्माननार्थं हि सर्वलोकपितामह:॥ २॥
सर्वावध्यत्वमतुलमनयोर्दत्तवान् पुरा।
वरोत्सेकेन मत्तौ च प्रमथ्य महतीं चमूम्॥ ३॥
सुराणाममृतं वीरौ पीतवन्तौ महाबलौ।
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में ब्रह्माजी से वरदान पाकर इनका अभिमान बढ़ गया और ये अहंकार से भर गए। अश्विनीकुमारों का मान बनाए रखने के लिए समस्त लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने पहले ही इन दोनों को यह अद्वितीय वरदान दे दिया था कि इन्हें कोई नहीं मार सकता। उस वरदान के अभिमान से मदमस्त होकर इन दोनों महारथियों ने देवताओं की विशाल सेना का मंथन करके अमृत पी लिया॥ 2-3 1/2॥
 
‘In the past, after receiving a boon from Lord Brahma, their pride increased and they were filled with arrogance. To maintain the honour of the Ashwini Kumars, Lord Brahma, the grandfather of all the worlds, had earlier given these two the unique boon that no one can kill them. Intoxicated with the pride of that boon, these two mighty warriors churned the huge army of the gods and drank the nectar.॥ 2-3 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)