श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 6: हनुमान जी का रावण तथा अन्यान्य राक्षसों के घरों में सीताजी की खोज करना  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  5.6.42-43 
मध्वासवकृतक्लेदं मणिभाजनसंकुलम्।
मनोरममसम्बाधं कुबेरभवनं यथा॥ ४२॥
नूपुराणां च घोषेण काञ्चीनां नि:स्वनेन च।
मृदङ्गतलनिर्घोषैर्घोषवद्भिर्विनादितम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
मधु और मदिरा के गिरने से भूमि गीली हो रही थी। रत्नजटित पात्रों से युक्त वह विशाल महल कुबेर के महल के समान शोभायमान लग रहा था। वह भवन पायल की झंकार, करधनी की झंकार, ढोल-नगाड़ों और तालियों की मधुर ध्वनि तथा अन्य वाद्यों की गहरी ध्वनि से गूंज रहा था।
 
The ground was getting wet due to the honey and liquor falling in it. That huge palace filled with jeweled vessels looked as beautiful as Kuber's palace. That building was resonating with the tinkling of anklets, the jingling of belts, the sweet sound of drums and clapping and other instruments making deep noises.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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