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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 6: हनुमान जी का रावण तथा अन्यान्य राक्षसों के घरों में सीताजी की खोज करना  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  5.6.38-39 
स मन्दरसमप्रख्यं मयूरस्थानसंकुलम्॥ ३८॥
ध्वजयष्टिभिराकीर्णं ददर्श भवनोत्तमम्।
अनन्तरत्ननिचयं निधिजालं समन्तत:।
धीरनिष्ठितकर्माङ्गं गृहं भूतपतेरिव॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
उसने देखा कि वह महल मंदार पर्वत के समान ऊँचा था, उसमें मयूर क्रीड़ा स्थल थे, वह झण्डियों से सुशोभित था, वह अनन्त रत्नों का भण्डार था और चारों ओर से खजानों से भरा हुआ था। उसमें ऋषियों ने खजानों की रक्षा के लिए उपयुक्त अनुष्ठान किए थे और वह स्वयं भूतनाथ (महेश्वर या कुबेर) का महल सा प्रतीत हो रहा था।
 
He saw that the palace was as tall as Mount Mandara, with places for playing peacocks, adorned with flags, a storehouse of infinite gems and filled with treasures from all sides. In it, the wise men had performed the rituals suitable for the protection of treasures and it looked like the palace of Bhutnath (Maheshwar or Kuber) himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)