भवतामननुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि माम्॥ १२॥
सागरोऽप्यतियाद् वेलां मन्दर: प्रचलेदपि।
न जाम्बवन्तं समरे कम्पयेदरिवाहिनी॥ १३॥
अनुवाद
आपकी आज्ञा के अभाव के कारण ही मेरे प्रयास रुक रहे हैं। समुद्र अपनी सीमा लांघ जाए और मंदार पर्वत अपने स्थान से हट जाए, परन्तु शत्रु सेना के लिए युद्धस्थल में जाम्बवान को विचलित करना कभी संभव नहीं है।॥12-13॥
‘It is because of your lack of orders that my efforts are stopping me. The ocean may cross its limits and Mandara mountain may move from its place, but it is never possible for the enemy army to disturb Jambavan in the battlefield.॥ 12-13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥