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श्लोक  5.58.85 
तासु चैव प्रसुप्तासु सीता भर्तृहिते रता।
विलप्य करुणं दीना प्रशुशोच सुदु:खिता॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
जब वे सब सो गए, तो सीता, जो सदैव अपने पति के कल्याण के लिए सजग रहती थीं, अत्यंत दुखी और दुःखी होकर करुणापूर्वक विलाप करने लगीं।
 
After they all fell asleep, Sita, who was always alert to the welfare of her husband, began to mourn with compassion, becoming extremely miserable and sad.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)