श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  5.58.43 
ततोऽहं विपुलं रूपं संक्षिप्य निमिषान्तरात्।
तस्या हृदयमादाय प्रपतामि नभ:स्थलम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
'तब मैंने पलक झपकते ही अपने विशाल रूप को छोटा कर लिया और उसका हृदय निकालकर आकाश में उड़ गया।
 
‘Then, in the blink of an eye I made my huge form very small and after taking out his heart, I flew into the sky.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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