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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
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सर्ग 58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना
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श्लोक 41
श्लोक
5.58.41
बाढमित्येव तां वाणीं प्रत्यगृह्णामहं तत:।
आस्यप्रमाणादधिकं तस्या: कायमपूरयम्॥ ४१॥
अनुवाद
तब मैंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी सलाह मान ली और अपना शरीर उनके मुख के आकार से भी अधिक बड़ा कर लिया ॥41॥
Then I accepted his advice saying, 'Very good' and I enlarged my body much more than the size of his face. ॥ 41॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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