श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.58.33 
अर्थसिद्धौ हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम्।
समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे सज्जन! श्रेष्ठ! अब आप अपने कार्य की सिद्धि के लिए सुखपूर्वक यात्रा करें और विदेहनन्दिनी सीता को महात्मा रघुनाथजी से पुनः मिलाएँ॥33॥
 
Gentle! The best! Now you travel happily for the accomplishment of your work and reunite Videhnandini Sita with Mahatma Raghunathji. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)