पुनर्दृष्टा च वैदेही विसृष्टश्च तया पुन:॥ १६५॥
तत: पर्वतमासाद्य तत्रारिष्टमहं पुन:।
प्रतिप्लवनमारेभे युष्मद्दर्शनकाङ्क्षया॥ १६६॥
अनुवाद
तत्पश्चात मैंने पुनः विदेहनन्दिनी का दर्शन किया और उनसे विदा लेकर अरिष्ट पर्वत पर आया। वहाँ से आपके दर्शन की इच्छा से मैंने प्रतिपल्वन (पुनः आकाश में उड़ना) आरम्भ किया।
After that I again had darshan of Videhanandini and then took leave from her and came to Arishta mountain. From there, with the desire to see you, I started Pratipalvan (flying in the sky again).
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥