श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  5.58.158 
पुच्छेन च प्रदीप्तेन तां पुरीं साट्टगोपुराम्।
दहाम्यहमसम्भ्रान्तो युगान्ताग्निरिव प्रजा:॥ १५८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, जैसे प्रलयकाल में समस्त प्रजा को जला डाला जाता है, वैसे ही मैं बिना किसी भय के अपनी जलती हुई पूँछ की अग्नि से बुर्ज और गोपुरसहित उस नगर को जलाने लगा॥158॥
 
Then, like a catastrophe burning down all the people, without any fear I began to burn that city, including the tower and the gopura, with the fire of my burning tail.॥ 158॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)