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व्यवसायं च तं बुद्ध्वा स होवाच महागिरि:॥ १२॥
पुत्रेति मधुरां वाणीं मन: प्रह्लादयन्निव।
पितृव्यं चापि मां विद्धि सखायं मातरिश्वन:॥ १३॥
अनुवाद
मेरा निश्चय जानकर महागिरि मैनाक ने प्रसन्न होकर मधुर वाणी में मुझे 'पुत्र' कहकर संबोधित किया और कहा, 'मुझे अपना चाचा समझो। मैं तुम्हारे पिता वायुदेवता का मित्र हूँ।' 12-13
‘Understanding my resolve, Mahagiri Mainak, delighted in his heart, addressed me in a sweet voice as ‘son’ and said, ‘Consider me your uncle. I am a friend of your father Vayudevata.' 12-13.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥