श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 58: जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान जी का अपनी लङ्का यात्रा का सारा वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 106-107
 
 
श्लोक  5.58.106-107 
उत्तरं पुनरेवाह निश्चित्य मनसा तदा।
हनूमन् मम वृत्तान्तं वक्तुमर्हसि राघवे॥ १०६॥
यथा श्रुत्वैव नचिरात् तावुभौ रामलक्ष्मणौ।
सुग्रीवसहितौ वीरावुपेयातां तथा कुरु॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
उस समय मन बनाकर उन्होंने पुनः मुझसे कहा - 'हनुमान्! तुम श्री रघुनाथजी को मेरा सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाओ और ऐसा प्रयत्न करो कि वे दोनों वीर भाई श्री राम और लक्ष्मण सुग्रीव सहित मेरी बात सुनकर तुरन्त यहाँ आ जाएँ॥106-107॥
 
At that time, after making up his mind, he replied to me again - 'Hanuman! You should narrate my entire story to Shri Raghunathji and make such efforts that those two brave brothers Shri Ram and Lakshman along with Sugreeva should come here immediately after hearing about me.॥ 106-107॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)